- मल में खून, पेट दर्द और बिना वजह वजन गिरना हो सकते हैं कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षण
- ज्यादा वजन से हो सकता है कोलन कैंसर का खतरा, उम्र के साथ बढ़ता है बीमारी का जोखिम
क्या है कोलोरेक्टल कैंसर?
कैंसर इंडिया के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर कोलन या रेक्टम का कैंसर है। कोलन और रेक्टम बड़ी आंत के हिस्से हैं। कोलन की लंबाई करीब 5 फीट लंबी होती है और स्टूल (मल) से पानी को सोखती है। जबकि रेक्टम कोलन का आखिरी 12 सेमी हिस्सा होता हैं, जहां शरीर स्टूल को स्टोर करता है।
इस तरह का कैंसर कोलन और रेक्टम में प्रीकैंसरस पॉलिप्स के विकास से शुरू होता है। इन्हें कोलन और रेक्टम कैंसर भी कहा जाता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर शुरू कहां से हुआ है। दोनों तरह के कैंसर में कई चीजें समान होती हैं।
किस उम्र के लोगों को ज्याद प्रभावित करता है कोलोरैंक्टल कैंसर?
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक, यह कैंसर महिलाओं और पुरुषों दोनों को प्रभावित करता है। आमतौर पर यह 50 साल या इससे ज्यादा उम्र के लोगों में पाया जाता है।
अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार, कोलोरेक्टल कैंसर को रोकने का सबसे अच्छा तरीका रेग्युलर स्क्रीनिंग है। स्क्रीनिंग प्रक्रिया के तहत लोगों में कैंसर की जानकारी का पता तब भी लगाया जा सकता है कि जब उन्हें लक्षण नजर नहीं आ रहे हों। आमतौर पर स्क्रीनिंग शुरू में कोलोरेक्टल कैंसर का पता लगा सकती है। एक पॉलिप को कैंसर बनने के लिए 10 से 15 साल का वक्त लगता है। स्क्रीनिंग के जरिए डॉक्टर पॉलिप्स को कैंसर में बदलने और बढ़ने से पहले उनका पता कर शरीर से निकाल सकते हैं।
क्या आप भी कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम में हैं?
कैंसर इंडिया के अनुसार, ऐसे कुछ रिस्क फैक्टर्स जिन्हें बदला नहीं जा सकता।
- उम्र: जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है, इस कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है। नई उम्र के लोग भी कोलोरेक्टल कैंसर का शिकार हो सकते हैं, लेकिन 50 साल की उम्र के बाद इस कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।
- कोलोरेक्टल पॉलिप्स या कोलोरेक्टल कैंसर का इतिहास: अगर आपकी मेडिकल हिस्ट्री में खास तरह के पॉलिप्स (एडीनोमैटस पॉलिप्स) का जिक्र है, तो जोखिम ज्यादा है। पॉलिप्स की संख्या और आकार ज्यादा होने पर कैंसर का जोखिम और बढ़ जाता है।
- इनफ्लेमेट्री बाउल डिसीज (IBD) का इतिहास: अगर आप पहले अलसरेटिव कोलाइटिस या क्रोन्स बीमारी का शिकार हो चुके हैं तो कोलोरेक्टल कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है। अगर आपको IBD है तो आपको स्क्रीनिंग की शुरुआत करनी चाहिए।
- परिवार में किसी को कोलोरेक्टल कैंसर हुआ हो: अगर परिवार में किसी नजदीकी व्यक्ति को कोलोरेक्टल कैंसर हुआ है तो आपको ज्यादा रिस्क हो सकता है। अगर उस रिश्तेदार को कैंसर 45 साल की उम्र से पहले हुआ है तो यह खतरा और बढ़ जाता है।
इसके अलावा पीढ़ियों से चले आ रहे कुछ जैनेटिक सिंड्रोम्स कोलन कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इन सिंड्रोम्स में फैमिलियल एडीनोमैटस पॉलिपोसिस और हैरेडिट्री नॉनपॉलिपोसिस कोलोरेक्टल कैंसर शामिल हैं।
रिस्क फैक्टर जो आप बदल सकते हैं
- मोटापा: अगर आप मोटे हैं तो कोलन कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।
- स्मोकिंग: अगर आपको लंबे समय तक सिगरेट की आदत रही है तो कोलन कैंसर के विकसित होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा ज्यादा अल्कोहल का इस्तेमाल भी जोखिम बढ़ा सकता है।
- टाइप 2 डायबिटीज: अगर आपको डायबिटीज है और इंसुलिन नहीं ले रहे हैं तो आपको कोलन कैंसर का ज्यादा खतरा हो सकता है।
- एक्टिव न रहना: अगर आप शरीर को मूवमेंट नहीं करते हैं और फिजिकल एक्टिविटीज नहीं करते हैं तो आपके शरीर में कोलन कैंसर के विकसित होने की संभावना बढ़ती है।
- डाइट: अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के अनुसार, ज्यादा फल, सब्जी, साबुत अनाज कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को कम कर सकते हैं। जबकि रेड और प्रोसेस्ड मीट इसे बढ़ा सकता है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं है। कई स्टडीज से पता चला है कि रेड और प्रोसेस्ड मीट कोलोरेक्टल कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। रेड और प्रोसेस्ड मीट को कम करना और ज्यादा फल और सब्जियां खाना रिस्क को कम करने में मदद कर सकता है।
कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षण?
सीडीसी के अनुसार, कोलोरेक्टल पॉलिप्स और कोलोरेक्टल कैंसर के लक्षण हमेशा नजर नहीं आते हैं। खासतौर से पहली बार में। ऐसे में कोलोरेक्टल कैंसर के लिए नियमित स्क्रीनिंग कराना बहुत जरूरी है। कैंसर इंडिया के मुताबिक, अगर आपको इनमें से कोई भी परेशानी नजर आ रही है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
- लगातार कब्ज या दस्त बने रहना, पेट पूरी तरह से साफ नहीं होने का अहसास या मल का आकार बदलना समेत बाउल हैबिट्स में बदलाव आना।
- रैक्टल एरिया से खून बहना या मल में या मल के ऊपर खून के काले धब्बे होना।
- पेट में ऐंठन, सूजन, गैस या दर्द का बने रहना।
- बिना वजह थकान, कमजोरी, भूख में कमी या वजन कम होना।
- पेल्विक एरिया में दर्द होना। यह दर्द बीमारी की बाद की स्टेज में होता है।